Sunday, October 3, 2010

पैसा बरसता रहेगा तब तक...

शास्त्रों के अनुसार धन की देवी महालक्ष्मी की कृपा से धन की वर्षा तब तक होती है जब तक कोई व्यक्ति निम्न कार्यों से दूर रहता है।
- जब कोई व्यक्ति अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसंकर, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनों के दोष देखने वाला हो जाता है, तब चाहे वह कितना ही धनी क्यों न हो, जल्दी ही निर्धन हो जाता है।
- जब कोई व्यक्ति मन में दूसरा भाव रखते हैं और ऊपर कुछ और ही दिखाते हैं। उन्हें लक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं होती।
- जब कोई स्त्री अपने घर को साफ और व्यवस्थित नहीं रखती और दूसरों की बुराई आदि करने में लिप्त रहती है। उनके घर से भी लक्ष्मी चली जाती हैं।
- जो स्त्री पति के प्रतिकूल बोलती हैं और दूसरों के घरों में घूमती-फिरती हैं। उन स्त्रियों के घर से लक्ष्मी चली जाती हैं।
- जो व्यक्ति अधार्मिक कार्यों में फंस जाता है। उसे लक्ष्मी त्याग देती है।

महालक्ष्मी की कृपा के लिए यह उपाय करें-
- प्रतिदिन किसी भी शिवलिंग पर पूरी श्रद्धा से जल चढ़ाएं।
- प्रतिदिन शिवलिंग पर बिल्वपत्र चढ़ाएं।
- रोज रात के समय शिवजी के समक्ष दीपक जलाएं।
- अधार्मिक कार्यों से खूद को दूर रखें।
- पीपल पर जल चढ़ाएं और सात परिक्रमा प्रतिदिन करें।
- महालक्ष्मी पति श्री विष्णु का पूजन करें।

स्वर्ग और नर्क क्या है?

एक बार किसी गुरु से उसके शिष्य ने पूछा मैं जानना चाहता हुं कि स्वर्ग व नरक कैसे हैं? उसे गुरु ने कहा आंखे बंद करों और देखों। शिष्य ने आंखे बंद की और शांत शुन्यता में चला गया। गुरु ने कहा अब स्वर्ग देखों और थोड़ी देर बाद कहा अब नर्क देखों। उसके थोड़ी देर बाद गुरु ने पूछा- क्या देखा? वह बोला स्वर्ग में मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा जिसकी लोग चर्चा करते हैं न ही अमृत की नदियां, न स्वर्ण भवन और न ही अप्सराएं। वहां तो कुछ भी नहीं था और नर्क में भी कुछ भी नहीं था न अग्रि की ज्वालाएं, न पीडि़तों का रूदन कुछ भी नहीं।शिष्य ने पूछा- इसका क्या कारण है? मैंने स्वर्ग देखा या नहीं देखा? गुरु हंसे और बोले- निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नर्क देखे हैं लेकिन अमृत की नदियां, अप्सराएं, स्वर्ण भवन, पीड़ा व रूदन तुझे स्वयं वहां ले जाने होंगे। वे वहां नहीं मिलते जो हम अपने साथ ले जाते हैं वही वहां उपलब्ध हो जाता हैं। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नर्क । व्यक्ति जो अपने अंदर रखता है, वही अपने बाहर पाता है। भीतर स्वर्ग है तो बाहर स्वर्ग है और भीतर नर्क हो तो बाहर नर्क है। स्वयं में ही सब कुछ छुपा है।

ऐसे देगा पैसा आपके दरवाजे पर दस्तक......

क्या आप चाहते हैं कि आपके जीवन में भी कुछ ऐसा हो जाए कि हर तरफ से धन कि बारिश होने लगे लक्ष्मी आपके दरवाजे पर दस्तक दे और आपके जीवन से सारी आर्थिक परेशानियां खत्म हो जाए तो नीचे लिखे इस उपाय को अपनाकर आप भी अपने जीवन कि धन से जुड़ी सारी समस्याओं से निजात पा सकते हैं।
- घर के मुख्य दरवाजे पर कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं और बासमती चावल की ढेरी पर एक सुपारी में कलावा बांध कर रख दें। धन का आगमन होने लगेगा।
- सुबह शुभ मुहूर्त में एकाक्षी नारियल का कामिया सिन्दूर कुमकुम व चावल से पूजन करें धन लाभ होने लगेगा।

कैसे बढ़ाएं बैंक बैलेंस?

बैंक में पैसा जमा करवाते समय हर व्यक्ति यही सोचता है कि उसके खाते में हमेशा एक बड़ा अमांउट रहे, कभी भी उसका बैंक बैलेंस जीरो न हो। जीवन में आने वाले उतार - चढ़ाव ऐसा होने नहीं देते, कभी बैंक बैलेंस बढ़ता है तो कभी घटता है। अगर आप चाहते हैं कि आपका बैलेंस हमेशा बढ़ता रहे तो आप निम्न उपाय कर सकते हैं-
1- जब भी आप बैंक में पैसा जमा करवाएं तो प्रयास करें कि पश्चिम मुखी होकर ही कार्य करें ।
2- मानसिक रूप से निम्न मंत्र का जाप करें- ऊं श्रीं श्रीं श्रीं
3- यदि इससे भी लाभ नहीं हो तो शुक्रवार को तुलसी के पौधे के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाएं व ऊपर दिए गए मंत्र का जाप करें इस उपाय से आपके खाते में धन सदैव बढ़ता रहेगा।

क्या करें अगर पैसा नहीं टिकता?

अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो है लेकिन पैसा टिकता नहीं। पैसा आता तो है पर चला जाता है, पता ही नहीं चलता। कितनी ही कोशिश करें पर घर मे बरकत नहीं रहती। यदि आप भी इसी समस्या से परेशान हैं तो नीचे लिखे उपाय को अपनाकर अपनी इस परेशानी से छुटकारा पा सकते हैं।

- जब भी आप घर में अनाज पिसवाएं तो उसमे ग्यारह पत्ते तुलसी के साथ ही दो पत्ती केसर डाल कर, उसमें से थोड़े से अनाज को रात को निकालकर मंदिर में रखकर सुबह उस अनाज को सारे अनाज में मिलाकर पिसवा लें। इस प्रयोग से आपकी समस्या का शीघ्र ही समाधान हो जाएगा और घर में भी बरकत रहने लगेगी।

यह है सफलता का पहला सूत्र

आज हर कोई मैनेजमेंट के सूत्र जानने के पीछे भाग रहा है। तरह-तरह की किताबें और एक पूरी साहित्य शृंखला सफलता के सूत्रों पर लिखी जा चुकी है। क्या कारण है कि युवा पीढ़ी फिर भी इतनी अशांत और असफलता के भावों से घिरी है। शायद हमारे सूत्रों में ही कोई कमी रह गई है, ऐसा सोचकर हम फिर नई किताबों की ओर मुड़ जाते हैं। अध्यात्म के भी अपने कुछ सूत्र हैं जो हमें सफलता की ओर ले जाते हैं। इन सूत्रों को अगर अपना लिया जाए तो सफलता तो मिलती है लेकिन साथ में एक चीज और मिल जाती है वह है शांति।

प्रतिस्पर्धा के चलते स्वास्थ्य पर ध्यान देना लगभग भूल जाते हैं। अनियमित दिनचर्या और खानपान लगभग हर दूसरे युवा की परेशानी है। हमें सेहतमंद रहने के लिए हनुमानजी से प्रेरणा लेनी चाहिए। उनके जीवन में झांके तो सफलता और सेहत दोनों के महत्वपूर्ण सूत्र मिलते हैं। लगातार सक्रिय रहते, परिश्रम करते हुए अपनी स्वयं की देह का ध्यान रखना भी एक योग है। सधी हुई सेहत सफलता के लिए जरूरी है। श्रीहनुमान सेहत के श्रेष्ठï उदाहरण हैं। हनुमानजी के स्वास्थ्य का राज रामायण के सुंदरकांड में लिखा है। सीताजी से मिलने के बाद जब उन्हें भूख लगी तो माताजी से निवेदन किया और सीताजी ने उनसे कहा

देखी बुद्घि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयॅं धरि तात मधुर फल खाहु।।

''हनुमानजी को बुद्घि और बल में निपुण देखकर जानकीजी ने कहा जाओ हे तात श्री रघुनाथजी को हृदय में बसाते हुए मीठे फल खाओ और हनुमानजी ने फल खाए। इसमें संदेश यह है कि मनुष्य को फलाहारी या शाकाहारी होना चाहिए। शाकाहार शरीर को स्वस्थ्य रखता है और श्रीराम को हृदय में रखकर फल खाने का अर्थ है शुद्घ स्वच्छता से भोजन करना। शुद्घ भोजन, स्वच्छ वातावरण में अच्छे भाव से यदि किया जाए तो शरीर पर अनुकूल असर करता है और इसका परिणाम है हनुमानजी जैसी सेहत। महाभारत के समय जब पांडव अपना वनवास काट रहे थे उस समय भीम द्रौपदी के लिए फूल लाने के उद्देश्य से वन में प्रवेश कर गए। उन्हें केले का बगीचा दिखा। भीम की गर्जना सुनकर जंगल के जानवर पशु-पक्षी डरकर इधर-उधर भाग गए। इस वन में हनुमानजी भी रहते थे। वे मार्ग में विश्राम कर रहे थे। भीमसेन ने उन्हें पहचाना नहीं और उनसे उलझ गए तथा जाने के लिए मार्ग मांगने लगे। हनुमानजी ने कहा आप चाहें तो मेरी पूंछ हटाकर जा सकते हैं। भीम को अहंकार था, जैसे ही पूंछ हटाने का प्रयास किया। पूंछ टस से मस नहीं हुई। तब भीम ने पूछा आप कौन हैं और हनुमानजी का परिचय हुआ। भीम का अहंकार जाता रहा। एक युग बीत जाने पर भी हनुमानजी उतने ही स्वस्थ्य और ताकतवर थे।

जिंदगी की रफ्तार को रोकें नहीं

जीवन में सफलता के कुछ सूत्र स्थायी होते हैं, जो हर परिस्थिति में उपयोग भी लाए जा सकते हैं और हर बार उतने ही प्रभावी भी साबित होते हैं। सफलता का एक और ऐसा ही सूत्र है चलते रहना। जिंदगी में सबसे जरूरी है चलते रहना। इसके बहाव को रोकने की कोशिश नहीं करना चाहिए। कैसी भी परिस्थिति हों हमें जीवन की गति को कम नहीं करना चाहिए। मंजिल तभी मिलेगी।

जब तक जीवन में हमेशा चलते रहने का भाव नहीं आएगा, हम जिंदगी के मिजाज को समझ ही नहीं पाएंगे। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि हिन्दू धर्म का नदी से बड़ा गहरा संबंध है। सरिताओं को बड़ा सम्मान दिया गया है भारतीय संस्कृति में। नदी का अर्थ है बहाव। नदियों ने हर धर्म को ताजगी और सुगंध प्रदान की है। नदी के दुरूपयोग और सूखने का अर्थ है मनुष्य की आध्यात्मिक वृति तथा स्थिति पर प्रहार। इतिहासकारों की मानें तो सभी प्रमुख धर्मों और सभ्यताओं की गवाह नदियां रही हैं। भारत जो कभी आर्यावर्त था, ने अपनी पूरी संस्कृति और धर्म को सिंधु-गंगा-यमुना के तट पर ही प्राणवान किया। मिस्त्र की सभ्यता नील नदी के अंचल में पनपी। चीन में हांग-हो का महत्व, पूजनीय स्थिति का है। यूनानियों ने जिसे मेसोपोटामिया के नाम से पुकारा वह क्षेत्र भी जल से घिरा है। संसार के तीन प्रसिद्ध धर्म यहूदी (सियोन), ईसाई और इस्लाम इसी जल क्षेत्र की पैदाईश हैं।इसीलिए जल और धर्म के रिश्तों को अच्छी तरह समझकर सम्मान देना होगा।

नदियों ने भूखंडों को ही नहीं जोड़ा है बल्कि मनुष्यों की धार्मिक भावना को भी एक जैसी शीतलता से भिगोया है। कोई धर्म जब-जब अपने आपको पूर्ण और अलग बताता है तो नदियां कहती हैं हमारे बहाव ने बहुत कुछ एक-दूसरे धर्म में उधार पहुंचाया है, मिलाया है और आदान-प्रदान किया है।हर बदलते वक्त में हर धर्म ने अपना-अपना श्रेष्ठ एक-दूसरे को दिया और लिया है। जो भले लोग हैं उन्होंने इसका सद्पयोग किया और जो बुरे हैं उन्होंने दुरूपयोग किया। नदी और जल से सीखा जाए शुभ को देना। किसी बहती नदी के किनारे बैठ जल पर दृष्टि गड़ा दीजिए वह बहाव आपको गहरे ध्यान में ले जाएगा। जल का प्रवाह मन के बहाव को नियन्त्रित कर देगा। इसे कहते हैं प्रकृति का चमत्कार।